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इन रूहानी एहसासों से

Shreyasi Satish

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ऐसा लगा कि चाँद बन, तुम मुझको देखा करते हो,
        
                                                    
                            
पेड़ों की ओट से छुपकर, फिर क्यों पर्दा करते हो।

कल-कल, छल-छल बहती हुई इन आबशारों में,
लगता है जैसे अब भी तुम ही तो गाया करते हो।

गुलशन में फूल खिले तो हैं, पर महक सिर्फ़ तुम्हारी है,
क्या वाक़ई तुम अपनी ख़ुशबू लुटाया करते हो।

बहुत परेशाँ हो जाती हूँ मैं, इन रूहानी एहसासों से,
समझा करो क्यों हर जगह मुझको भरमाया करते हो।

चंचल हवा जब जुल्फ़ें बिखेरे,तो कुछ भी दिखता नहीं,
कांटे जो खींचे आँचल मेरा, लगे तुम ही खींचा करते हो।
14 घंटे पहले
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