ख़ूब हो आया काशी काबा राम-रहीम की चौखटें
तब जाना, उपर वाला बैठा था मेरे घर के भीतर
या ख़ुदा! कभी सामने आ, राज कुछ अपना बता
ख़ूब परेशां कर चुका तू, लुकाछिपी न किया कर
जिसके परहेजों पाबंदियों इबादतों में उम्र गुज़ार दी
न मालूम उसे है भी या नहीं, मेरी थोड़ी कोई ख़बर
सुना ख़ूब एका है तेरा मेरा, एक ही तो रुह हैं हम
पर ये रिश्ता कैसा, मैं गरदिश में और तू आसमां पर
सह ली हर पटकनी तेरे नाम, कभी अर्श कभी फर्श
हां ये इम्तहां सिर्फ़ मेरे नहीं, तेरे वजूद पे भी है नज़र।
- श्रीधर
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