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अच्छी लगती है ख़ुशियाँ तुम्हारी ----

Shreedhar Editors,

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अच्छी लगती है हमें, ख़ुशबू उनके मुसर्रतों की,
        
                                                    
                            
ये पहली और आखिरी निशानी है, मोहब्बतों की।

मानते हैं, गुज़रे मौसम फिर लौटकर आते नहीं,
हवा में पर मौजूद हैं, सरगोशियाँ उन चाहतों की।

हम रास्तों में क़ैद हैं, और वो मंजिलों पे मुन्तिज़र
या ख़ुदा! रहगुज़र हो कोई, दो दिलों को राहतों की।

बेशक तू मेरा ही मेरा है, हो कोई और तेरा ही तेरा,
और कैसे समझाऊँ तुम्हें, हदें मेरी उल्फ़तों की।

हिज्र में सुकून है, वस्ल की तमन्ना कभी रही नहीं,
माशूक़ दुनियावी मेरा, मगर आरज़ू है जन्नतों की।
3 घंटे पहले
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Shivam Awasthi

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