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पत्थर की बारिश

SHASHANK SRIVASTAVA

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पत्थर की बारिशों में,
        
                                                    
                            
शीशे का छाता लेके निकला हूँ,
ज़ख्मों को हँसी में छुपाकर,
मैं फिर मुस्कुराता निकला हूँ।

रास्ते में काँटे बहुत हैं,
फिर भी फूलों की चाहत रखता हूँ,
लोग गिराने में लगे हैं मुझे,
मैं हर गिरावट में उठता हूँ।

पत्थर की बारिशों में,
शीशे का छाता लेके निकला हूँ,
लोगों ने कहा था टूट जाऊँगा,
मैं खुद को आज़माने निकला हूँ।

रास्ते में अँधेरे बहुत हैं,
फिर भी उजाला लेके निकला हूँ,
जिस मोड़ पे सबने साथ छोड़ा,
वहीं से मैं दोबारा निकला हूँ।

जेबों में कुछ ख़्वाब हैं,
आँखों में थोड़ा पानी है,
लोग कहते हैं मुश्किल है,
मुझे लगता है यही तो कहानी है।

धूप ने जलाया तो क्या,
छाँव का हुनर सीख लिया,
जिसने भी समझा मुझे ख़त्म,
मैंने वहीं से सफ़र लिख लिया।

मंज़िल अगर दूर है तो हो,
पैरों में अभी जान बाकी है,
आज मेरी ख़ामोशी है मगर,
कल मेरी पहचान बाकी है।

पत्थर की बारिशों में,
शीशे का छाता लेके निकला हूँ,
टूटने का डर था कभी,
अब टूटकर भी सँवरने निकला हूँ।

-शशांक श्रीवास्तव
4 घंटे पहले
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