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मुकदर

शास्त्री जगमोहन रमण

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर ज़र्रे की तमायिस में ये पीर है,
        
                                                    
                            
ये अचानक आँखें चुराना भला कोई ताबीर है।

हम लड़ जाएँ इश्क़ में भगवान कृष्ण से मगर,
इंसानों से लड़ जाएँ, भला इतना भी कोई कहाँ वीर हैं।

तू देखे तो मैं एक सिर्फ़ तलबगार हूँ तेरा,
अगर मेरे नज़रिए से देखे, पूरा शहर तेरा तस्वीर है।

यूँ देखे तो तेरे एहसासात कहाँ मेरे लिए,
ज़िद बना लूँ अगर, तो सनम तू अब भी कहाँ मुझसे दूर है।

तेरे गाल पर मुक़द्दर लाली लाने वाले होंगे लाखों मगर,
मालूम होते हुए कि तू न मिलेगी,
फिर भी तुझे चाहते रहना ये मेरा गुरूर है।
2 महीने पहले
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