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कारवाँ ए अमन

Şhahnawaz Pahat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मुसलमान होना जुर्म है तो इस जुर्म की सज़ा दी जाए
        
                                                    
                            
मगर इस गुनाह की वजह भी बता दी जाए
कारवाँ गर अमन का तुम्हारी आंखों में चुभता है
तो ज़ुल्म की मशाल से इसमें आग लगा दी जाए

मैं ढूँढता हूं फिर पुराने हिंदुस्तान को
जहां नींद अपनी चादर उतारती थी
अज़ान की तकबीर से
मंदिर की घंटियों से

जहां अब्दुल वुजू करता था आबे गंगा से
राधा बच्चों को दम कराती थी मस्जिद के बाहर

मुझे हिन्दुस्तान की वही पुरानी शाम लौटा दी जाए

ये बच्चों के झगड़े
ये पड़ोसी के मसाइल
चलो इसमें धर्म की हवा दी जाए

सियासत की चाल है, धर्म का जो ये जाल है
सारे शहर में घूम के ये बात बता दी जाए

मैं राम का वंश हूँ और मुहम्मद का अंश हूँ
मुझे गीता व कुरआन की आयतें पिला दी जाएं

जहां राम ने ख़ुदा को और
ख़ुदा ने राम को ललकारा हो
मुझे युद्ध की वो भूमि भी दिखा दी जाए।
-अश्क़ फ़तेहपुरी
एक घंटा पहले
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