खुद को खुद से छुपाने की
तरकीब बता ए जिंदगी !
सूरत-ऐ-हाल को बदल पाने की
तरकीब बता ए जिंदगी !
स्याह रात की सुबह
नजर नहीं आती
उजाले की कोई किरण
नजर नहीं आती
अंधेरों से बाहर आने की
तरकीब बता ऐ जिंदगी !
जीने का हौसला जगाने की
तरकीब बता ऐ जिंदगी !
खुद को आईने में देखूं
तो नजरें झुक जाती हैं
कुछ ख़यालात आते ही
साँसे रुक जाती हैं
माज़ी को भूल जाने की
तरकीब बता ऐ जिंदगी !
परेशां हूँ, संभल जाने की
तरकीब बता ऐ जिंदगी !
यूं ही जीना है ऐ जिंदगी !
तो क्यूँ हो उम्र बड़ी
कुछ यूं हो कि बिखर जाए
टूट कर सांसों की लड़ी
सांसों का बोझ उठाने की
तरकीब बता ऐ जिंदगी !
या इस वजूद को मिटाने की
तरकीब बता ऐ जिंदगी !
-सत्यपाल सिंह