विज्ञापन

जन्माष्टमी के पेड़े

Satyapal Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जन्माष्टमी का त्योहार
        
                                                    
                            
उत्साह का त्योहार
हर्षोल्लास का त्योहार
पेड़े (मिष्टी) बनाने का त्योहार
खाने और खिलाने का त्योहार

क्या अद्भुत नजारा
रसोई का होता था
मिट्टी का साफ सुथरा
लीपा पोता चूल्हा
उपलों की धधकती लौ
उस पर दूध से भरी
लोहे की बडी सी कढाई
अति प्रसन्न मुद्रा में
ममता की मूरत, मां 🙏👩🍼
कढाई में पलटा चलाती हुई
मां से चिपक कर
बैठने की होड में
सब भाई बहनें
पास बैठकर देखा करते थे
दूध से खोवा बनते हुए
ना बनावट ना मिलावट
साक्षात शुद्घ असली

फिर पेड़े बनते थे
थाल परांत में सजते थे
हम खुद को जोड लेते थे
बरती की जमात में
सब को कहते थे
मैं चरती नहीं
बरती हूँ
खुद को बहुत
गौरवान्वित महसूस करते थे

पर ममता को मंजूर नहीं था
हमारा भूखे रहना
माँ हमें समझाती थी
व्रत के नियम बताती थी
छींके के नीचे बैठाती थी
दुलार से खूब पेड़े खिलाती थी

कहती थी जब भी भूख लगे
खा लेना बैठकर छींके के नीचे
इससे तुम्हारा व्रत नहीं टूटेगा ।
कन्हैया तुमसे नहीं रूठेगा ।
वह भी तो चोरी चोरी
माखन खाता था ।
और "मैं नहीं माखन खायो"
यशोदा मैया को बताता था ।


मां की ममता
और हमारी भोली आस्था
दोनों विजयी थे ।
अपनी अपनी जगह
दोनों सही थे ।।















जन्माष्टमी का त्योहार
उत्साह का त्योहार
हर्षोल्लास का त्योहार
पेड़े (मिष्टी) बनाने का त्योहार
खाने और खिलाने का त्योहार
क्या अद्भुत नजारा
रसोई का होता था
मिट्टी का साफ सुथरा
लीपा पोता चूल्हा
उपलों की धधकती लौ
उस पर दूध से भरी
लोहे की बडी सी कढाई
अति प्रसन्न मुद्रा में
ममता की मूरत, मां 🙏👩🍼
कढाई में पलटा चलाती हुई
मां से चिपक कर
बैठने की होड में
सब भाई बहनें
पास बैठकर देखा करते थे
दूध से खोवा बनते हुए
ना बनावट ना मिलावट
साक्षात शुद्घ असली
फिर पेड़े बनते थे
थाल परांत में सजते थे
हम खुद को जोड लेते थे
बरती की जमात में
सब को कहते थे
मैं चरती नहीं
बरती हूँ
खुद को बहुत
गौरवान्वित महसूस करते थे
पर ममता को मंजूर नहीं था
हमारा भूखे रहना
माँ हमें समझाती थी
व्रत के नियम बताती थी
छींके के नीचे बैठाती थी
दुलार से खूब पेड़े खिलाती थी
कहती थी जब भी भूख लगे
खा लेना बैठकर छींके के नीचे
इससे तेरा व्रत नहीं टूटेगा ।
कन्हैया तुझसे नहीं रूठेगा ।
वह भी तो चोरी चोरी
माखन खाता है ।
और मैं नहीं माखन खायो
यशोदा मैया को बताता है ।


मां की ममता
और भोली आस्था
दोनों विजयी थे ।
अपनी अपनी जगह
दोनों सही थे ।।
3 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

12470 कविताएं

View Profile

Ramesh Raj

25 कविताएं

View Profile