तेरी साँसो की महक से
महकी हैं गैर की रातें ।
मैं अब किस हक से कहूँ
इन सांसो पर मेरा हक है ।।
तेरी शोखी, तेरा हंसी, तेरी हया,
सब बेशकीमती थे मेरे लिए ।
काश ! समझ लेती मेरे जज़्बात
उनका सौदा करने से पहले ।।
-सत्यपाल सिंह