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भंवर में फंसा हूँ

Satyapal Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लड़खड़ाए है कदम
        
                                                    
                            
संभलना मुश्किल है ।
भंवर में फंसा हूँ
निकलना मुश्किल है ।।

रिश्तों के चमन में, बबूल बेहिसाब हैं
बिखरे हैं हर तरफ काँटे
टहलना मुश्किल है ।।

जहां जीवन सवेरा देखा, उछल, कूदे, खेले
अपनी ही उस बस्ती से
अब गुज़रना मुश्किल है ।।

जो मौन खडे देख रहे, वे कोई अजनबी नहीं
कौन अपना, कौन पराया
तय करना मुश्किल है ।।

भंवर में फंसा हूँ
निकलना मुश्किल है ।।
-सत्यपाल सिंह
5 महीने पहले
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