एक रथ थमने वाला है
एक रथ चलने वाला है ।
है पहुंचना तय मंजिल पर
अखंड पथ सजने वाला है ।।
न मन में धर कोई चाह अब
मुस्कुरा - न भर कोई आह अब ।
भंवर जाल का पिंजरा तोड़
भ्रमित खग उड़ने वाला है ।।
क्यों चित अशांत, व्यथित मन है
है गमन तय उसका, जो चेतन है ।
हुआ नाट्य अंत, अब रंगमंच का
अंतिम पट गिरने वाला है ।।
-सत्यपाल सिंह