रात ढलती है मगर, मन का यह शोर नहीं थमता,
हद से ज्यादा सोचना, इस दिल को है डसता।
दिन गुजर जाता है यूँ ही, दुनिया की इस भीड़ में,
पर परिंदा थका हारा, लौटता अपनी ही नीद में।
आज के दौर का सच, कितना अजीब हो गया,
जो दूर था दिल से, वो दर्द के करीब हो गया।
अपनी ही पीड़ा का खुद ही, इलाज करना पड़ता है,
यहाँ तो हर इंसान बस, अपने लिए ही लड़ता है।
हाल-ए-दिल बयां करने की, खता अब हम नहीं करते,
दिलों में नफरतें रखकर, लोग महफिल हैं भरते।
बाँटोगे जो जख्म अपने, तो नमक छिड़क दिया जाएगा,
तमाशा बनाकर तुम्हारा, यहाँ हर कोई मुस्कुराएगा।
पर हारना मत ऐ मुसाफिर, इस अकेले सफर की राह में,
ढूंढना अपनी खुशी तुम, खुद की ही चाह में।
जमाने का क्या है, यह तो बस बातें बनाना जानता है,
जो खुद से जंग जीत ले, इतिहास उसी को मानता है।
-: सार्थक पियुष सिंह