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अंतर्मन के राम

Sarthak Piyush

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मन के भीतर ढूँढो ईश्वर, बाहर तो बस शोर यहाँ,
        
                                                    
                            
सच्चा देव वही है रहता, जहाँ न हो कोई ढोंग-धुआ।

भीड़-भाड़ और भव्य मेलों में, खो जाता इंसान कहीं,
मुश्किल में जब आँखें रोतीं, तब दिखता भगवान वहीं।

लाखों लोग जहाँ मर जाते, संकट का जब आता काल,
प्रश्न उठता है तब मन में, कहाँ छुपा है दीनदयाल ?

पत्थर की मूरतों में केवल, ढूंढ न तू अपनी तकदीर,
भूखे को जो भोजन दे दे, वही बदलता है तस्बीर।

अंधभक्त बन आँख मूँदकर, मत पीछे तू भाग यहाँ,
सत्य-असत्य का भेद जानकर, जाग उठा ले कदम नया।

ढोंग रचाकर जो खाते हैं, धर्म नाम का फैला जाल,
उनसे दूरी रखना भाई, वे करते हैं मन बेहाल ।

भगवान बसाओ अपने अंदर, मन को तुम पावन कर लो,
सच्ची सेवा, शुद्ध भावना, जीवन में तुम धारण कर लो।

जब संकट की घड़ी आती है, धीरज ही काम आता है,
कर्मठ रहकर जो जीता है, वही पार लग पाता है।

सच्चा तीर्थ है मन का आँगन, निर्मल गंगा सी हो धार,
प्रेम-भाव हो हर प्राणी से, ऐसा हो अपना संसार।

मानवता ही सबसे उपर, यही सिखाता हर अंतर्मन,
सच्चे देव की खोज खत्म हो, जब सुधर जाए यह जीवन।

-: सार्थक पियुष सिंह
13 घंटे पहले
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