जो रखता है आईना, वो सच दिखाता है
सारे अदाकारों का, उसमें चित्र आता है
आप कह देते हो, नाम किसी का नहीं
सच है नाम किसी का, बचा ही नहीं
कवि अनुभवजनित, कल्पना दिखाता है
चोर को दाढ़ी में, तिनका दिख जाता है
नाटक तो चल रहा है, मंच सर्वदा तैयार
कुछ पर्दे के इस पार, कुछ हैं उस पार
-कुँवर