जुदा होकर भी तू मुझमें कहीं बाकी है।।
तेरी खुशबू मेरे कमरे में अभी बाकी है।।
मैने तो तेरा शहर कब का छोड़ दिया ,,
वो राहें गुलफ़ाम वो शाम वहीं बाकी है।।
तूने तो कहा था के भूल जाओगे मुझे,,
ये तो बता भूलने में क्या कमीं बाकी है।।
लोग कहते थे इक दिन सब्र आ जाएगा,,
मुझसे पूछो के प्यालें में कितनी बाकी हैं।।
इक तेरा ज़िक्र जिसने कर दिया बर्बाद,,
ख़ुदा के नाम पे बस ख़ुदकुशी बाकी है।।
हद है ना जिसे भी चाहो वही क़त्ल करे,
क्या दुनियाँ में उसकी ही गली बाकी है।।
तोड़ गया इक हवा का झोंका ही देव,,
क्या हवाओं में भी कुछ नमीं बाकी है।।
-सुनील देव