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झूठ बोलता है

Saloni Tyagi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पराए इत्र की खुशबू बदन से जब छलकती है,
        
                                                    
                            
मेरी हर आस अंदर तक तड़पकर फिर सिसकती है,
मैं सब कुछ जानकर भी चूमती हूँ माथा उसका,
न जाने क्यों मेरी ये रूह उस पर ही पिघलती है,
मगर वो साफ़ चेहरे पर नया एक अक्स मलता है,
वो आँखों में आँखें डाल के झूठ बोलता है।

मोहब्बत के लिबास में वो ज़हर हर रोज़ घोलता है,
ग़ैरों की गली में जाकर वो दिलों को टटोलता है,
मैं वाक़िफ़ हूँ उसकी हर एक साज़िश से,
मगर,मेरा ये बेबस दिल बस उसी के नाम पर डोलता है,
उसकी वफ़ा का तराज़ू सिर्फ नफ़रत को ही तोलता है,
वो आँखों में आँखें डाल के झूठ बोलता है।

मेरी ही पाकीज़गी का वो सरेआम मज़ाक उड़ाता है,
न जाने किस मजबूरी में मेरा दिल उसे चाहता है,
वो ज़हर देकर मुझे फिर झूठा मरहम लगाता है,
मेरा हर एक अश्क उसकी साख को बचाता है,
वो धोखे के बीज मेरी ही मोहब्बत में बोता है,
वो आँखों में आँखें डाल के झूठ बोलता है।
एक घंटा पहले
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