लंदन से लौटा सूट-बूट, वह ठाठ-बाठ दरबारी था,
पर भीतर बैठा मोहन तो, जन-जन का आज्ञाकारी था।
चंपारण की माटी छूकर, जब दर्द देश का जान लिया,
तज दिए जूते, चोगा बदला, पीड़ा को अपनी मान लिया।
खेड़ा की उस पावन धरती पर, खादी का पावन व्रत आया,
स्वावलंबन और आत्मसम्मान का, चरखे ने संगीत सुनाया।
पर मदुरई की राहों में जब, इक दर्द अनोखा जाग उठा,
"खादी महँगी, हम कैसे लें?" सुन अंतरतम वैराग उठा।
सोचा—मैं कैसे ओढ़ूँ पूरा, जब भारत मेरा नंगा है,
करोड़ों वंचित भाई-बहनों का, जीवन ही इक दंगा है।
जुटा साहस तीन-चार दिनों में, मदुरई ने वह रूप जिया,
बाईस सितंबर इक्कीस को, उसने आधी धोती को अपना लिया।
"मैं कैसे रहूँ अलग इनसे, जब पिंडलियाँ इनकी नंगी हैं?
मैं खड़ा इन्हीं की पंक्ति में, ये ही तो मेरे संगी हैं।"
वह 'गांधी पोटल' गवाह बना, जब त्याग बना राष्ट्रीय निशान,
अर्धनग्न वह काया ही, बन गई देश की नई पहचान।
पहुँचे जब लंदन गोलमेज में, गोरे अखबार हँसते थे,
"देखो यह अर्धनग्न फकीर!" कह-कहकर व्यंग्य कसते थे।
पर शांत, चुटीले तीखे बाणों से, हँसकर वह बात पलट देता,
"चौथा दर्जा तो है ही नहीं, इसलिए तीसरे में चलता।"
कहा—"मेरे कपड़ों की फिक्र न कर ऐ पत्रकार तू महफ़िल में,
तुम्हारे राजा ने पहन रखे हैं, कपड़े हम दोनों के हिस्से के।"
जो उपहास उड़ाने आए थे, वो नतमस्तक हो हार गए,
उस सूती चादर वाले में, सब ईसा का अवतार देख गए।
झुक गया विलायत कदमों में, जो रचता नया विधान था,
वह आधी धोती वस्त्र नहीं, भारत का आत्मसम्मान था।
उपहास उड़ाने वाले भी, फिर इंटरव्यू को कतार में थे,
नग्नता बन गई 'तमगा-ए-शान', रॉबर्ट पायन के विचार में थे!