ये जो दिल है, ये इतना परेशान क्यों है,
तेरे जाने के बाद भी ये मेहरबान क्यों है।
मैंने माना कि तू अब मेरा रहा ही नहीं,
फिर भी हर ज़िक्र में तेरा ही नाम क्यों है।
लोग कहते हैं कि आसान है भूल जाना,
तो मेरी नींद में तेरा मकान क्यों है।
मैंने चाहा था तुझे — ये मेरी भूल सही,
पर ये भूल आज तक मेरी जान क्यों है।
तू अगर लौट भी आए तो तअज्जुब कैसा,
जो गया था वही दिल में मेहमान क्यों है।
इश्क़ इक आग है, सबको जला देती है,
फिर मेरे हिस्से में धुआँ-धुआँ क्यों है।
- राहुल साहनी