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उठा कसम अब रण की

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रोज अखबार में छपती है जो, वो चीख पुरानी बंद करो,
        
                                                    
                            
मोमबत्तियां बहुत जला लीं, अब ये ढोंग-कहानी बंद करो।
दरिंदगी की जो हद टूटी, अब उस हद को पार गिराना है,
न्याय की भीख न मांगो अब, खुद काल का रूप दिखाना है

निर्भया से कोलकाता तक, जो जख्म पुराना हरा हुआ,
उस वहशत पर इस भारत का, है कोना-कोना डरा हुआ।
अब डर का चोला फेंक बहा, बन जा बिजली की धार यहाँ,
जो उंगली उठे हवस बनकर, उस उंगली पर हो वार यहाँ।

कानून की ढीली फाइलों में, इंसाफ कहाँ मिल पाता है,
तारीखों के इस चक्कर में, हर दोषी बचकर जाता है।
मत आस लगा इस दुनिया से, ये दुनिया अंधी-बहरी है,
तेरे जिस्म पर जो खरोंच आई, वो चोट बहुत ही गहरी है।

अब बांध कफन तू माथे पर, अब लाज का घूंघट छोड़ जरा,
ये रीती-रिवाजों की बेड़ी, लातों से अपनी तोड़ जरा।
जो सिंहनी बनकर गरजेगी, तो गीदड़ सारे भागेंगे,
जब हाथ में होगी नंगी छुरी, तब सोए शासन जागेंगे।

मासूम सी उन किलकारियों को, जो नोच-नोच कर खाते हैं
क्या गिर गया इतना ये समाज, जहाँ बच्चे भी नोचे जाते हैं
अब ममता का आंचल छोड़ो, चंडी का रूप दिखाना है,
जो मासूमों पर हाथ डाले, उसे जिंदा ही दफनाना है।

जो कुर्सियों पर बैठे हाकिम, बस झूठा दर्द दिखाते हैं,
रईसों के महलों से केवल, खोखले भाषण आते हैं।
दर्दों का व्यापार है चलता, इस नकली हमदर्दी में,
इंसाफ़ यहाँ बस घुट जाता है, इस दुनिया की बेदर्दी में

उठो कि अब ये वक्त तुम्हारा, इतिहास बदलना बाकी है,
जो बयां न हो पाए वो सारे, हिसाब बदलना बाकी है।
अब खुद अपनी रक्षक बनकर, हर एक जाल को काट दो,
जो उंगली उठे तुम्हारी तरफ, उस उंगली को ही छांट दो

जो अंदर से हैं क्रूर बहुत, पर बाहर दर्द दिखाते हैं,
इस दुनिया के पाखंडी वो, बस झूठे अश्क बहाते हैं।
काले कौवे हंस बने हैं, उजली खादी पहन यहाँ,
मौन खड़ी है लाचार व्यवस्था, गुंगे बहरे लोग जहाँ।
-रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
 
3 महीने पहले
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