बर्फ जमी है चारों ओर, और हाड़ कँपाती चलती वात,
भूखा-प्यासा बैठा साधु, गिनता रहता काली रात।
महल निवासी सोते सुख से, ओढ़ दुशाले मलमल ताण,
सरहद का रखवाला रोए, संकट में हैं उसके प्राण।
मिट्टी के घर को गरमाकर, जिसने बदली जग की रीत,
बर्फीले मरुथल में गाए, जिसने केवल शिक्षा गीत।
विज्ञान लगाया जन-हित में, त्यागा उसने अपना सुख,
आज उसी की झोपड़ी ऊपर, देख रहा है पूरा रुख।
बर्फ सहेज कर स्तूप बनाए, प्यासी घाटी दी सिंचाय,
आज उसी के खुद के आँसू, कोई सुध लेने ना आय।
कागज़ के वादों की नौका, पानी में ही डूब गई,
पर्वत जैसी सच्ची निष्ठा, जाने क्यों अब रूठ गई।
बधिर बने हैं कुर्सी वाले, फाईलों में बंद विधान,
चमक-दमक की दुनिया वाले, भूल गए सब ऊँचे थान।
सत्य अहिंसा का जो नारा, केवल भाषण में सत्कार,
अंन त्याग कर सत्याग्रही, देख रहा झूठा दरबार।
पर ना टूटे हिम्मत उसकी, सीना ताने खड़ा अटल,
जैसे ऊँचा पर्वत कोई, हिला न पाए कोई बल।
बिना शस्त्र के लड़ने निकला, वो वीरों का सच्चा लाल,
मौन व्रत ही अस्त्र बना है, खुद ही खड़ा काल का काल।
झुकना होगा अभिमानी को, बदलेगा इतिहास विधान,
जीतेगी माटी की खुशबू, जीतेगा सच्चा इंसान।
जब-जब जागा मौन तपस्वी, सिंहासन तब-तब डोला,
अंगारों पर चलने वाला, बनकर चमकेगा शोला।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'