पुरानी डायरी के पन्नों में, वो बचपन सिसकियाँ भरता है,
बिछड़कर तुझसे ओ साथी, ये रोहित रोज़ ही मरता है।
हज़ारों लोग हैं इस भीड़ में, जो हाथ तो मिलाते हैं,
तेरे साथ बीते थे, वो दिन कहाँ लौट पाते हैं
वो तेरा सच मुझे अब जाके समझ में आया है,
ये दुनिया मतलबी है, पास बस कोई न अपना साया है।
अकेला हूँ मगर अब सीख ली मैंने तेरी वो बातें,
जियो तो खुद के लिए, ऐसे कटती हैं यहाँ रातें।
खिलौने काँच के लेकर, हम अपनी उम्र से खेले,
बड़े होकर समझ आया, किसे कहते हैं ये झमेले।
तरसती है ये छाती आज, वो कंधे का सुकून खोया,
तुझे जो ढूंढने निकला, तो मैं एकांत में रोया।
वो आधी धूप की छुट्टी, वो पानी की तरफ़ भागना,
तेरा वो डाँटना मुझको, मेरा रातों को फिर जागना।
वो कंचे तोड़कर हमने, जो आधी जीत पाई है,
कसम से यार वो दौलत, आज आँसू बनके आई है।
खड़े हैं आज उस मोड़ पर, जहाँ से रास्ते जुदा हुए,
तलाशूं कैसे मैं तुझको, कि हम दोनों ही लापता हुए।
तिजोरी भर गई मेरी, मगर वो बेफ़िक्री का दौर कहाँ,
कटी जो जेब बचपन की, मिला वैसा ना कोई दौर यहाँ।
कहा था तूने जो मुझसे, वही तो सच का संसार है,
ज़माने की इस भीड़ में, अब कहाँ मिलता कोई प्यार है।
तू जहाँ भी हो एक आवाज़ दे, मेरी साँसों की यही पुकार है,
बिछड़े उस यार रविंद्र पान्नू पर, मेरा सब कुछ आज निसार है।
-रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'