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पेटवाड़ की माटी: जहाँ हर गाँव का वजूद मुस्कुराता है

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भले ही छू लें हम आसमान, पर दिल तो अपनी माटी में रहता है,
        
                                                    
                            
मेरा गाँव 'पेटवाड़' केवल नाम नहीं, हर गाँव की रगों में बहता है।
शहर की इन ऊँची दीवारों में वो सुकून कहाँ मिल पाता है,
जब याद आती है जन्मभूमि, तो आँखों में जल भर आता है।

वह सुबह-सुबह विहगों का चहकना, और खेतों की वो हरियाली,
पनघट पर सखियों का वो जमघट, और सावन की झूला-डाली।
नीम की शीतल छाँव तले, बुजुर्गों का वो हुक्का गुड़गुड़ाना,
बिना किसी स्वार्थ के आपस में, सुख-दुख की बातें बतलाना।

मिट्टी की वो सोंधी खुशबू, जब पहली बारिश आती है,
महँगे इत्रों की हर एक महक, उसके आगे फीकी पड़ जाती है।
कच्चे रास्तों पर नंगे पैर दौड़ना, वो तितलियों के पीछे भागना,
देर रात तक अंबर के तारों की छाँव में, निश्छल होकर जागना।

जिला 'हांसी' का गौरव है यह, पूरे 'हरियाणा' की यह शान है,
जहाँ पसीने की हर एक बूँद में, बसा हुआ इंसान का स्वाभिमान है।
हर गाँव की यही पावन गाथा, हर गाँव का यही अभिमान है,
इस सादगी के आगे तो, पूरा वैभव भी कुर्बान है।

मैं दुनिया के किसी भी कोने में रहूँ, मेरा वजूद यहीं मुस्कुराएगा,
जब भी पुकारेगी माटी मुझे, यह 'नादिर' दौड़कर वापस आएगा।
'रोहित शर्मा भारद्वाज' की कलम से, यह वंदना बारंबार है,
यहीं से शुरू हुई ज़िंदगी मेरी, और यहीं मेरा पूरा संसार है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर' 
3 महीने पहले
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