बुलंदियों पर बैठकर वो ज़मीन का दर्द क्या जानें,
जो कागज़ी तरक्की को ही हक़ीक़त का जहान मानें।
वोटों की फसल कटते ही जो अक्सर बहरे हो जाते हैं,
वो नवाब भला भूखी अवाम की चीख़ क्या पहचानें।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'