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मूल्यच्युत महातंत्र: उठो आज हुंकार भरो तुम!

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उठो आज हुंकार भरो तुम, अब कोई न बचाने आएगा,
        
                                                    
                            
जो सोया रहा गुलामी में, वो मिट्टी में मिल जाएगा!

छोड़ो यह लाचारी अपनी, सीधे अब प्रतिकार करो,
जो लूट रहा हक जनता का, छाती पर उसके वार करो।मंडियों में जो बैठे अमीर,वह तेरा वोट चबाएँगे,
तुम चुप बैठे रहे आज तो,वह तुमको खा जाएँगे।
जो चोट करेगा जनता पर, वो खुद ही मिटता जाएगा,
उठो आज हुंकार भरो तुम, अब कोई न बचाने आएगा ।

कब तक भीख माँगोगे न्याय की, इन बिकती चौकियों के द्वारे,
कैसी रक्षा माँग रहे तुम, सोए हाकिम बैठे जहाँ सारे,
जो गरीबों का खून पी रहे,वो क्या तेरा मान बचाएँगे,
खाकर टुकड़े इन चोरों के,वो बस तुमको ही धमकाएँगे।सड़ चुका है जो पूरा ढांचा, वो क्या यहाँ इंसाफ लाएगा,
उठो आज हुंकार भरो तुम, अब कोई न बचाने आएगा ।

बिक चुके हैं पहरेदार यहाँ, सफेदपोश बस ढोंग रचाए,
इंसाफ के उस मंदिर में भी, अंधा कानून न्याय दबाए।काली वर्दी, उजला कुर्ता,गठबंधन यह बहुत बड़ा है,
इस चौखट पर हक तुम्हारा,वर्षों से लाचार खड़ा है।
जब रक्षक ही भक्षक बन बैठे, कौन यहाँ अधिकार दिलाएगा,
उठो आज हुंकार भरो... तुम अब कोई न बचाने आएगा।

सड़कों पर जब चीख गूँजती, मासूमों का हरण होता है,
सिंहासन की गोदी में बैठे, उन भेड़ियों का वंदन होता है।तुम ही कहो ये आँसू तुम्हारे,किस पत्थर दिल को पिघलाएँगे,
जो खुद बैठे हैं दाग छिपाकर,वे क्या आबरू को बचाएँगे,
यदि आज न जागे तुम इंसान, तो कल इतिहास भी रोएगा,
उठो आज हुंकार भरो तुम, अब कोई न बचाने आएगा।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
2 महीने पहले
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