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कहाँ गई वो चिड़िया

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बहते गंगाजल से पूछो, कहाँ गया वो प्यार हमारा?
        
                                                    
                            
कहाँ गया वो छोटा आँगन, कहाँ गया वो यार हमारा?
रूठना-मनाना साथ में रहना, कहाँ गया संसार हमारा?
सबको गले लगाना पल में, कहाँ गया व्यवहार हमारा?
अब तो बस सूनी गलियाँ हैं, रोता है परिवार हमारा,
उड़ गई वो सोने की चिड़िया, सूना है घर-बार हमारा।

गुरुओं के चरणों में झुकना, बड़ों का वो सम्मान कहाँ है?
बच्चों की वो निश्छल बातें, सुंदर सा अरमान कहाँ है?
आपस का वो मीठा बंधन, वो सच्चा इनसान कहाँ है?
सुख-दुख में जो साथ निभाए, ऐसा अब वो प्रान कहाँ है?
झूठे ठाठ-बाठ में खोया, आज हमारा ध्यान कहाँ है?
उड़ गई वो सोने की चिड़िया, खोई वो पहचान कहाँ है?

आए थे कुछ बाहर वाले, शान हमारी उन्होंने तोड़ी,
रत्न-जवाहर सब कुछ लूटा, दया न उनके दिल में थोड़ी।
पर इस दिल का सच्चा सोना, लूट सके न वो डोरी,
आज अपनों ने ही अपनों की, प्रीत यहाँ पर क्यों छोड़ी?
भूल गए हम अपनी माटी, आँख आज भारत की रोई,
उड़ गई वो सोने की चिड़िया, हमने अपनी किस्मत खोई।

भूल गए हम बड़े-छोटे का, वो गहरा नाता रे,
आज घरों में कोई मिलकर, बैठ न बातें गाता रे।
मन की नफ़रत दूर करें हम, बिगड़ी बात सँवारे रे,
लौट आए फिर वही पुराना, प्यार हमें जो पुकारे रे,
संस्कार का दीप जलाएँ, फिर हर एक घर के द्वारे रे,
उड़ गई वो सोने की चिड़िया, ढूँढ-ढूँढ सब हारे रे।

— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
3 सप्ताह पहले
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