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Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वही सादगी, नयन मनोहर, समय पूर्व ही आना है,
        
                                                    
                            
शंखनाद हिंदी साहित्य का, रस अविरल बरसाना है।
चाहे पावन मंत्र प्रार्थना, या कक्षा की वाणी हो,
वे गढ़ते संस्कार चेतना, जीवन अमर बनाना है।

अधरों पर मुस्कान सजी है, क्रोध कहाँ टिक पाता है?
ताड़न-ताड़ित का भय कैसा, लाड सभी को भाता है
परिवर्तन की एक डांट में, छुपा हुआ उपकार यहाँ,
गिला-शिकवा मुक्त हृदय वह, जो मिलनसार कहलाता है।

नेह अपार, हुनर का पावन, शीर्ष जूनून जगाता है,
मोह-मोह में महा-प्रेम का, ध्वज गुरुवर लहराता है।
अरे! प्रशंसा क्या ही की जाए? लघु शब्दों की औकात कहाँ,
जो नाप सके उस महा-पुरुष को, जो तिमिर चीर ले जाता है।

मैं छोटा था, सहमा सा था, मंच देख घबराता था,
भीड़-भाड़ की उस दुनिया में, मौन सदा रह जाता था।
पकड़ हाथ खींच लाए आगे, बोले— "उठ हुंकार भर!",
क्षण भर में वो भारी संशय, रण छोड़ दूर भाग जाता था।

फिर आया वार्षिक उत्सव तो, मैंने भी हुंकार भरी,
अब काहे का खौफ भला? जब गुरु-कृपा थी साथ खड़ी,
देख विस्मयकारी साहस को, सर ने सिंह-नाद किया,
थपथपा पीठ को बोले— "बढ़, राह खुली है बड़ी-बड़ी!"

गूँज उठी जो सिंह-गर्जना, सच कहूँ, क्या मेरी थी वो?
शब्द भले ही मेरे निकले, पर कंठ सुधीर सर का था वो!मेरी खामोश ज़ुबान को सर, गुरुवर ने ही आवाज़ दी,
अंधियारे में भटकते मुझको, राह नई और साफ़ दी!
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
2 महीने पहले
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