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ग़ज़ल:- लकीरें हाथ की अपनी मिटा कर ही चला हूँ मैं

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लकीरें हाथ की अपनी मिटा कर ही चला हूँ मैं
        
                                                    
                            
सफ़र का हर कड़ा पत्थर हटा कर ही चला हूँ मैं

हवाओं से कहो अपनी ये ख़ुद-दारी समेटें अब
कि पैरों की ये ज़ंजीरें जला कर ही चला हूँ मैं

मिरी परवाज़ का मंज़र ज़रा तुम देख लो रुक कर
फ़लक पर ख़ून का दरिया बहा कर ही चला हूँ मैं

मजाल-ए-मौज़ की क्या जो डुबो दे मेरी कश्ती को
पुराने साहिलों को भी भुला कर ही चला हूँ मैं

तराज़ू तोड़ डाले हैं अमीरी और ग़रीबी के
मिरी ये सादगी देखो वफ़ा कर ही चला हूँ मैं

मिलेगा क्या मुझे रोकोगे जब तुम इस ज़माने में
कि अपनी ज़ीस्त को नादिर लुटा कर ही चला हूँ मैं
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
2 महीने पहले
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