सुलग रही है आज चेतना, मन में अब अंगार भरो,
काँप उठे पापी की छाती, ऐसा उस पर वार करो।
मौन तोड़ कर आगे आओ, अब न कोई बात करो,
जिसने उजाड़ा हँसता आँगन, सीधे उस पर घात करो॥
कुचल दिया मासूम कली को, ऐसा घोर अधर्म किया,
इस धरती के हर मानव का, जिसने मस्तक शर्म किया।
दया भाव को त्याग हृदय से, महाकाल बन जाना है,
क्रोध अग्नि की तीखी लौ से, अधमी को झुलसाना है॥
काले साए घूम रहे जो, चुन-चुन कर संहार करो,
कानूनों की ढाल हटाकर, तीखा अब प्रहार करो।
जिस दानव ने आँख उठाई, आँख वही अब नोच लो,
सजा मौत से कम न होगी, मन में बस यह सोच लो॥
चीख गूँजती है जो मन में, वो प्रतिशोध जगाएगी,
इन दरिंदों की काली हस्ती, पल भर में मिट जाएगी।
क्षमा और सत्कार छोड़ कर, काल रूप धर लेना है,
किए कृत्य का बदला हमको, इस धरती पर देना है॥
शस्त्र उठा लो हाथ में अपने, रण का बिगुल बजाना है,
अत्याचारी इस पापी का, नाम धरा से मिटाना है।
जिसने छीनी हँसती साँसें, उसका काल बुलाना है,
नरपिशाच अपराधियों का, अब रक्त बहाना है॥
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'