वो सुबह देर तक सोना,अब ख्वाब बन गया है,
अलार्म की उस घंटी में,फिर से वही सजा है।
वो आम का मीठा स्वाद,और नानी के घर की रातें,
अब याद आ रही हैं,वो बेफिक्री की बातें।
वीडियो गेम के वो घंटे,और दोपहर की वो मस्ती,
याद आ रही है अब तो,अपनी वो कागज़ की कस्ती।
बैग का बोझ भारी है,और यूनिफॉर्म भी तंग है,
जाने क्यों इस नए सेशन में,मन थोड़ा सा बेरंग है।
पर दोस्तों से मिलने की,एक छोटी सी उम्मीद भी है,
लंच बॉक्स शेयर करने की,वो पुरानी सी प्रीत भी है।
फिर भी दिल धीरे से कहता,काश कुछ दिन और मिल जाते,
ये स्वर्णिम पल छुट्टियाँ वाले,अहर्निश यूँ ही चलते जाते।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'