विश्वास की निश्छल धरा पर, छल का मरुस्थल उग गया,
जो प्राण अर्पित था यहाँ, वह मौन होकर रुक गया।
संसार के इस रंगमंच पर, भावना बस स्वांग है,
शतरंज की इन चालों में, छुपा हर एक रंग है
वह नेह का कोमल सूत्र जो, इक बार सहसा टूटता,
संसार का हर भ्रम तभी, अंतस हमारा लूटता।
यदि जोड़ भी दें गाँठ देकर, विकृत विकल वह तार है,
उस गाँठ की कतरन हृदय को, चुभती लगातार है।
निष्कपट जो बन कर जिया, वह अंत में केवल रोया,
उसने जगत के बोध में, अपना सकल सर्वस्व खोया।
अब चेतना पाषाण है, संवेदना अवसान है,
इस दंभ भरे संसार में, व्याकुल आज इंसान है।
शून्यता के इस गरल को, कंठ में कैसे धरूँ?
इस निष्ठुर संसार का, मैं किस तरह वंदन करूँ?
अब अश्रु भी शुष्क हैं, केवल सुलगती श्वास है,
नैतिक मूल्यों के पतन पर, टूटता विश्वास है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'