विज्ञापन

बूँद का विसर्जन

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बचपन की सूनी गलियाँ अब रोती हैं छुप-छुप कर,
        
                                                    
                            
अल्हड़ वो चंचल तितली बिखरी है सूखी भुँई पर।
जो जनम-कथा पर सबकी शहनाई बन कर गूँजी,
वह कोख आज अपनों की बन गई पराई पूँजी।

चौखट के भीतर सिमटी, सुलगती भीतर-भीतर,
ज्यों सावन की वो बरखा, हो गई रेत की चादर।
पीड़ा की गठरी सिर पर, वह मौन ढो रही पल-पल,
आँखों की कोरों में ही रुक गया थमा सा नीर-जल।

यौवन की दहलीज़ों पर जब सजी नेह की थाली,
तब रीति-रिवाजों ने ही उसकी हर ख़ुशी मिटा ली।
जो जनती जग के नायक, वह ख़ुद को भूल चुकी है,
अपमानों के झूलों में जाने कब से वह झुकी है।

वह आदि-शक्ति की सूरत, पर दासी बन कर जीती,
घुट-घुट कर जीने वाली, घूँटों में ज़हर है पीती।
पहचान सकी न ख़ुद को, जो दिव्य तेज का घर थी,
पत्थर की उन दीवारों से, वह सदा अकेली डरती।

दिन बीते, बरसें गुज़रीं, बालों में श्वेता आई,
पर मन के सूनेपन की कम हुई न कभी परछाईं।
जिसने सबको जीवन दी, वह अंत समय तक हारी,
इस देह-दहन की वेला, अब आ पहुँची है भारी।

जब सूनी सूखी लकड़ियाँ, उस शांत देह को छूतीं,
तब राख बनी वो आँखें, अंतिम सिसकी में रोतीं।
मिट गई कहानी उसकी, जो केवल सहना जानी,
बस शेष रहा आँखों में, ओझल सा बहता पानी।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
3 सप्ताह पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all