प्रथम बार जब आँगन भीतर मधुर किलकारी आई,
लगा कि साक्षात प्रभु ने अनुपम कला दिखाई।
मूँद रखी थी छोटी मुट्ठी मुख पर लाली छाई,
सारे घर ने मिलकर अपनी नई दीवाली मनाई।
पलकें मूँदे सोई थी वह सुंदर से बिछौने पर,
जैसे कोई चंदा उतरा गोदी के कोने पर।
रेशम जैसी कोमल काया मन को हर्षित करती,
उस नन्हीं सी मूरत में ही सारी दुनिया बसती।
धीरे-धीरे समय बीतता करवट लेना सीखा,
पकड़ उँगलियाँ माता की फिर डगमग चलना सीखा।
घुटनों के बल चलते-चलते सारा घर सर आया,
जो भी सम्मुख वस्तु दिखाई उसको मीत बनाया।
उसकी सुंदर दो आँखों में अचरज सिंधु समाया,
पग-पग पर इस नई धरा का हर दृश्य मन भाया।
भोलापन मुख पर रहता था छल का लेश नहीं था,
उसके छोटे से जीवन में दुख का क्लेश नहीं था।
जब पहला शब्द कहा मुख से तब मिश्री सी घोली,
सब वेदों से बढ़कर लगती उसकी तोतली बोली।
पापा कहकर दौड़ लगाती बाहों में आती थी,
दिन भर की जो भी व्याकुलता पलभर में मिटती थी।
छोटी-छोटी बातों पर वह पल में रूठ दिखाना,
और मनाते ही माता के गले तुरंत लग जाना।
परियों की अद्भुत गाथा सुन रातों को सो जाती,
सपनों के सुंदर उपवन में चुपके से खो जाती।
पापा के जूतों को पहनकर सारा घर दौड़ती,
अपनी छोटी सी गुड़िया को माँ बन गोदी भरती।
माथे पर आड़ी-तिरछी सी बिंदी सदा सजाती,
होंठों पर लाली को मलकर खुशियाँ ही बिखराती।
कागज़ पर आड़ी रेखाएँ अपनी कलम से रचना,
और हँसकर सबको अपनी वह चित्रकारी सौंपना।
तैयार सुबह जब होती वह भारी बस्ता उठाए,
पहने सुंदर सुंदर कपड़े मंद-मंद मुसकाए।
पानी की बोतल लटकाकर जैसे जंग पर जाए,
घर वापस आकर स्कूल की सारी कथा सुनाए।
कभी तितली के पीछे भागना कभी धूप को छूना,
उसकी चंचल हरकतों से घर कभी न लगता सूना।
बचपन का वह निर्मल सावन तीव्र गति से बढ़ता,
वह छोटा सा कोमल पंछी नई उड़ानें भरता।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'