विज्ञापन

बेजान पुर्जे के आगे छोटा लगा सारा जहाँ!

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मम्मी-पापा से हठ करके, मैंने नया मोबाइल पाया है,
        
                                                    
                            
वाई-फाई के छोटे तार से, सारा जग कमरे में आया है।इस पतले से शीशे के भीतर, अगाध तमाशा दिखता है,
पल भर में हर प्रश्न का उत्तर, इसके परदे पर दिखता है।

जब से ये आया घर में, कमरा ही मेरा संसार हुआ,
बाहर की रौनक भूल गया, बस इस परदे से प्यार हुआ।
मम्मी आवाजें देती हैं, पर मुझको कुछ नहीं सुनता है,
मेरा यह छोटा सा मन अब, इसके ही सपने बुनता है।

नानी कोने में बैठी हैं, मैं उनके पास नहीं जाता,
दादी की परियों का किस्सा, अब मेरे मन को नहीं भाता।
जिनकी उँगली को थाम चला, उनका ही साथ पराया है,
कैसा जादू इस प्लास्टिक का, मेरे जीवन पर छाया है।

मम्मी-पापा जब कहते हैं, बेटा अब इसको बंद करो,
चिढ़कर मैं कहता हूँ उनसे, मुझे आप ना तंग करो।
जाने क्यों वो प्यारे चेहरे, दुश्मन जैसे लगते हैं,
जब तक फोन न मिले हाथ में, हम गुस्से में जगते हैं।

कैसी ये नादानी फैली, कैसा ये पागलपन है,
एक खिलौना रूठ गया तो, रोता अपना बचपन है।
बस एक मोबाइल के पीछे, कितनों ने जान गँवाई है,
इस छोटे से बक्से ने ये, कैसी आफ़त लाई है?

सोलह साल की इस उम्र में, मैं ये सच पहचान गया,
गैजेट्स मेरे सगे नहीं हैं, मैं ये बातें जान गया।
माँ की ममता, पापा का प्यार, सब कुछ पीछे छूट गया,
इस शीशे के चक्कर में, मेरा हँसता बचपन रूठ गया।

अपनों का जो सच्चा नाता, वो सबसे अनमोल यहाँ,
इस छोटे से पुर्जे के आगे, छोटा लगता सारा जहाँ।
ये तो बस बेजान खिलौने, जो अपनों को दूर करें,
इनके जाल में फँसकर हम, क्यों खुद को यूँ मजबूर करें?

अब मैं इस परदे को रखकर, अपनी सच्ची दुनिया देखूँगा,
नानी-दादी के पास बैठकर, मीठी-मीठी लोरी सुनूँगा।
मम्मी-पापा का हाथ पकड़कर, जीवन की राह पर चलूँगा,
मत खोना तुम अपनी जान दोस्तों, सबसे यही पुकार करूँगा।

— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all