विज्ञापन

बदलते सुर

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कल तलक जो तीखे तीेखे सवाल थे,
        
                                                    
                            
आज खुद वो उलझे हुए जवाब हो गए।
कुर्सी क्या मिली जनाब को शहर में,
इनके तो ठाठ भी हूबहू नवाब हो गए।

वो जो आए थे बदलने इस मुल्क का निजाम,
खुद ही कुर्सी के खेल में वो बेनकाब हो गए।
जनता के उन जलते मुद्दों पर अब चुप्पी क्यों छाई है?
मौसम क्या बदला, आपके तो सुर ही खराब हो गए।

जो कल तक ढूँढते थे हर बात में कमियाँ,
आज उनके ही दामन पर दाग बेहिसाब हो गए।
बदल गई है चाल, बदल गई है वो सादगी,
जनता के सारे सपने अब बस ख़्वाब हो गए।

ज़मीन से उठकर जो पहुँचे थे आसमाँ पर,
लगता है वो ज़मीन का पता ही भूल गए।
हुकूमत के नशे में डूबे हैं इस कदर,
कि वो आवाम के हक़ की दुआ ही भूल गए।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all