अज़ल से रूह की मिट्टी सजाना सब तमाशा है
बुने जो ख़्वाब हमने थे गँवाना सब तमाशा है
यहाँ हर शख़्स की जेबें भरीं शीशे के टुकड़ों से
मगर बाज़ार में ख़ुद को दिखाना सब तमाशा है
इबादत भी ख़ुदा की अब तिज़ारत बन गई जैसे
जो नफ़रत बो के आए हैं उगाना सब तमाशा है
अना की कोख से जन्मे हज़ारों झूठ के पुतले
जहाँ सच हमने बोला है जलाना सब तमाशा है
हमें तो मौत की हिचकी ही रास आती है अब 'नादिर'
जिएँ हम किस लिए आख़िर रचाना सब तमाशा है
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'