इस शहर की इमारतें गगनचुम्बी तो हैं,
मगर इनके भीतर का आसमान बहुत छोटा है।
यहाँ हर खिड़की पर एक बत्ती देर रात तक जलती है,
जहाँ कोई जागता नहीं,
बस एक स्क्रीन की नीली रोशनी में,
अपनी ही परछाइयों से बतियाता है।
हम सबने अपनी हथेलियों में समेट ली है दुनिया,
मगर अचरज देखो—
बगल की सीट पर बैठे सहयात्री का नाम तक मालूम नहीं।
दफ़्तर की मेज़ पर रखी कॉफ़ी की प्याली से
जब भाप उठती है,
तो उसमें दफ़्न अतीत के चेहरे धुँधले दिखाई देते हैं,
मगर हम उन्हें उँगलियों से साफ़ करने के बजाय
एक नया 'स्टेटस' अपडेट कर देते हैं।
रिश्ते अब 'नोटिफ़िकेशन' की मोहताज़गी में जी रहे हैं,
और भावनाएँ बदल गई हैं कुछ सुस्त 'इमोजीज़' में।
घर की उस पुरानी, दीमक लगी अलमारी के कोने में
आज भी सिसक रही हैं माँ की लिखी चिट्ठियाँ,
जिन्हें पढ़ने की फ़ुर्सत
इस 'हाई-स्पीड' नेटवर्क के पास नहीं है।
यह जो हम रोज़ ओढ़कर निकलते हैं एक हँसता हुआ चेहरा,
यह महज़ एक नक़ाब है,
ताकि कंक्रीट के इस ठंडे जंगल में
कोई हमारी तन्हाई का मज़ाक़ न उड़ा सके।
शाम ढले जब यह शहर सो जाता है,
तब हर आलीशान फ़्लैट के सन्नाटे से आवाज़ आती है—
कि हम सब ज़िंदा तो हैं,
मगर बसर नहीं कर रहे,
बस कट रहे हैं।
- रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'