सच्ची बताऊँ…
साँस अटक-अटक आती है,
बोझ है इन रिश्तों की उम्मीदों का,
समाज का,
और इस शरीर का भी।
दुःख इस बात का है
कि सब पता है,
फिर भी मैंने
इनसे निकलना नहीं चुना।
अगर मेरा जुड़ना
किसी का बंधन हो,
तो मेरा रिश्ता
किसी से न हो।
सच्ची बताऊँ…
तो ,
मैं जीना चाहूँ
जैसे जीने वाला कोई न हो—
न किसी की उम्मीद,
न किसी का डर,
न किसी बंधन का नाम।
मुझे बस होने दो,
चाहे खिला फूल हूँ,
मिट्टी का कोई ढेर हूँ,
या कभी नहीं भी हूँ।
मुझे बस
जीने दो।