दुनिया में दो ग़म ऐसे हैं जिनके मर्ज़ की दवा की तलाश में इंसान जिंदगी भर उलझन में रहता है। पहला है ग़मे रोज़गार और दूसरा ग़मे मोहब्बत। पहले ग़म का देर सवेर ही सही लेकिन हल निकल आता है, मगर दूसरा है कि ग़मे मोहब्बत ता-ज़िंदगी सालता है।
कहने को मैं कह सकता हूं कि अब काफ़ी अरसा हो गया और मैं बहुत दूर निकल चुका हूं, मुझे पहली मोहब्बत या आशिक़ी का वो ज़माना याद नहीं। सच कहूं आज भी रात की तन्हाई में उसकी याद आ जाती है। मैं ख़ुद को अकेला महसूस करता हूं। उस वक़्त ग़ुलाम अली की आवाज़ में यह ग़ज़ल सुनता हूं....
चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
खींच लेना वो मेरा पर्दे का कोना दफ़अतन
और दुपट्टे में वो तेरा मुंह छुपाना याद है
रात की तन्हाई में यह ग़ज़ल मेरी अधूरी मोहब्बत के मर्ज़ की दवा होती है। इसे सुनकर कुछ वक़्त के लिए दिल के ज़ख़्मों पर मरहम लगा महसूस होता है। यह ग़ज़ल 'निकाह' फ़िल्म में भी है, लेकिन इसे लिखा है फ्रीडम फ़ाइटर और मशहूर शायर हसरत मोहानी ने। हालांकि, ये ग़ज़ल काफ़ी पुरानी है पर अपने ख़ास अंदाज़ की वजह से इस ग़ज़ल की मक़बूलियत में दिन-ब-दिन इज़ाफा ही हुआ है। अधूरी मोहब्बत की कैफ़ियत को मरहम नुमा अल्फाज़ इस ग़ज़ल के अलावा शायद कहीं और मिलें।
इस ग़ज़ल के अल्फ़ाज़ से ना-मुकम्मल इश्क़ और मोहब्बत की बेक़द्री की यादें ताज़ा हो जाती हैं। और दिमाग़ दिल से कहता है कि दिले नादां अरसा बीत जाने के बाद भी तू उसे भुलाने को क्यों राज़ी नहीं। तो इस पर गम़ से लबरेज़ दिल कह उठता है ...
बेरुखी के साथ सुनना दर्द-ए-दिल की दास्तां
वो कलाई में तेरा कंगन घुमाना याद है
वक़्त-ए-रुख़्सत अलविदा का लफ़्ज़ कहने के लिये
वो तेरे सूखे लबों का थर-थराना याद है
मगर हां इतना ज़रूर है कि अफ़्सोस के आंसुओं के निकलने से दिल हल्का महसूस होता है। जब रात में पुरानी यादें ज़हन के दरीचों से दिल में उतरतीं है तो ऐसा ही एहसास होता है। तल्ख़ और दिल को ग़मगीन बनाने वाली यादें बहुत तकलीफ़देह होती हैं, दुनिया की हर शय मुरझाई हुई और बेरौनक़ लगती हैं। लोग सोचते हैं कि महबूब को न पाने से मोहब्बत ख़त्म हो जाती है। जबकि ऐसा है नहीं। मोहब्बत हमारी मिल्कियत होती है और इस के राज़दार सिर्फ हम होते हैं। वो यादें भुलाए नहीं भूलतीं...
दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिये
वो छज्जे पर तेरा नंगे पांव आना याद है
तुझसे मिलते ही वो बेबाक़ हो जाना मेरा
और तेरा दांतों में वो उंगली दबाना याद है
हालांकि, उन सुनहरी यादों को मैं भूलना भी नहीं चाहता। मैं चाहता तो ता-ज़िंदगी दिल मसोस कर यही सोचता कि मेरा इश्क़ मुकम्मल क्यों नहीं हुआ? मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ? और उसे बेवफ़ा कहता। लेकिन सच तो यह कि मुझे उसकी आशिक़ी ने एक बात सिखाई है। काफ़ी गौर करने के बाद महसूस कि मोहब्बत कभी कमज़ोर नहीं बनाती बल्कि दुनिया के कश्मकश के तूफ़ानों से पार पाने का हौसला अता करती है। और मेरा इस बात पर पुख़्ता यक़ीन है। मेरे दिल को अब सब्र की आदत हो गई है और वो बस यही कहता है...
चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है
जब भी मुझे आशिक़ी का वो ज़माना सालता है तो मैं यह ग़ज़ल सुन लेता हूं। क्योंकि इससे दिल एक लंबे अरसे का फ़ासला तय करता हुआ उसी ज़माने में चला जाता है, जब मैं आशिक़ी के ख़्वाबों को ह़कीकत में बदलने की जद्दोजहद में नाकाम हुआ था। इस तरह यादों का यह सिलसिला ग़म देने के बजाए मेरे लिए ता-ज़िंदगी साथ रहने वाला मोहब्बत का बेशक़ीमती ख़ज़ाना बन जाता है।
सुनिए अधूरी मोहब्बत की यह ग़ज़ल....