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आजकल यूं....

Rawat Rajni

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आजकल यूं .....
        
                                                    
                            
आजकल यूं तन्हाइयां बातें करतीं है।
मुझसे जज्बात यूं रू ब रू होते हैं।
बस गहरी रात हो जब सब सोते हैं।
हम तब साथ होते हैं।
कहते हैं हाले दिल इक दूसरे से इल्जामात लगाते हैं।
बस फैसला जब सुनाते हैं
दोनों ही बेकसूर होते हैं।
क्या किससे पूछे अपने बारे में
अब हम हर किसी के किससे में हम ही गुनेहगार होते हैं।
हर जख्म मरहम के लायक नहीं है यहां।
अक्सर देखा है महफिलों इनके खातिर नमक का इंतजाम होता है।
अब रखते नहीं खैरो खबर दुनिया की ।
कब सुबह को कब दिन ढले
रहते हैं खोये मस्ती में अपनी
गैरों की मर्जी अब न चले
दे जाये फूल कोई हमें इसकी
इल्तिज़ा नहीं ।
हाथों में अपने खुद गुलाब रखते हैं।
मांगता नहीं खैर कोई अपनी दुआयें मांगता नहीं ।
बस निकले जो भीड़ में दुनिया की
साथ में रख कफन खुद को महफूज रखते हैं।
आजकल यूं रजनी पाण्डेय...
7 घंटे पहले
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