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माँ की ममता

Ratna Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कम नहीं होती माँ की ममता,
        
                                                    
                            
गर बेटा छोड़ घर जाता है,
लेकर अपनी जीवन संगिनी को,
पृथक आशियाना बनाता है,
नहीं लेता फिर माँ की सुध वह,
अपनी ज़िंदगी में रम जाता है।

याद दिलाती माँ अपनी ममता,
बेटा क्या तू सब कुछ भूल गया,
बाँहों में मेरी क्रीड़ा करता था,
तू लोरी सुनकर सोता था।

नहीं चाहिये धन और दौलत,
अपने साथ मुझे तू रहने दे,
नहीं चाहिये बंगला मोटर,
प्यार तेरा संग रहने दे,
बाँहों में तुझको पाला था,
अब बाँहों में तेरी मुझको सोने दे।

इतनी बदकिस्मत ना बना मुझको,
कि लोग मुझ पर तरस खायें,
और कंधा देने मुझको,
अड़ोस पड़ोस के लोग निकल आयें।

मुखाग्नि देने गर तू ना आया,
चिता पर देह मेरी जल जायेगी,
आत्मा बेचैन होकर मेरी,
भटकने लग जायेगी,
पितरों में मैं बनकर कागा,
तेरे आँगन आऊंगी,
ग्रहण कर तेरे हाथों से भोजन,
चैन से मैं सो जाऊंगी।

-रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)


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7 वर्ष पहले
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