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सपनों की ई.एम.आई.

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सपने हमें इ.एम.आइ. पर मिलते हैं,
        
                                                    
                            
सपनों की शुरुआत अच्छी जीवन-शैली पाने की चाहत से होती है,
पहले एक छोटा-सा घर चाहिए,
फिर घर में चमकता हुआ फर्नीचर चाहिए,
और फिर लगता है…
ज़िंदगी को थोड़ा और बेहतर होना चाहिए।

मोबाइल पुराना हो जाए तो,
मन कहता है नया होना चाहिए,
गाड़ी में खरोंच दिख जाए तो,
चेहरा थोड़ा उदास होना चाहिए,
पड़ोसी के घर कुछ नया आए तो,
हमारे घर में भी वैसा ही होना चाहिए।
किस्तों की लंबी कतार है,
हर महीने एक नया इम्तिहान है,
तनख़्वाह आते ही बँट जाती है,
फिर भी चेहरे पर मुस्कान है,

क्योंकि बाज़ार ने समझा दिया है…
जो आज नहीं खरीद सकते,
वह भी आपका अधिकार है।
सपनों को हमने जरूरत कहा,
जरूरतों को हमने शौक़ कहा,
शौक़ धीरे-धीरे आदत बने,
और आदतों को जीवन का हिसाब कहा,
बस इसी हिसाब में,
कहीं सुकून पीछे छूट गया।

कभी पिता की पुरानी साइकिल
बहुत बड़ी सवारी लगती थी,
माँ की रसोई की खुशबू,
पूरी दावत लगती थी,
दो जोड़ी कपड़ों में भी,
इंसान कितना खुश रहता था,

तब जिंदगी कम थी शायद,
मगर जीने का स्वाद ज्यादा था।
अब हर चीज़ आसान है,
बस चैन थोड़ा महँगा है,
घर बड़ा है, मगर आँगन छोटा है,
सामान बहुत है, मगर अपनापन थोड़ा है,
किश्तें समय पर जाती रहें…
इसी चिंता में,
कई बार पूरा महीना जाता है।

फिर भी सपने देखना मत छोड़ना,
बस सपनों का अर्थ बदलना,
सिर्फ़ चीज़ें खरीदने की चाहत नहीं,
कुछ रिश्तों को भी संभालना,
कभी अपने लिए वक्त निकालना,
कभी अपनों के साथ बैठकर,
बिना किसी वजह के मुस्कुराना।

क्योंकि जिंदगी का सबसे सुंदर सपना,
वह नहीं जो इ.एम.आइ. पे मिल जाए,
वह है…
सुबह उठो तो मन हल्का हो जाए,
रात सोओ तो कोई डर न सताए,
घर छोटा हो तो भी दिल बड़ा हो जाए,
और जो मिला है उसी में,
जीने का हुनर आ जाए।

- रतन कुमार कैथवास
9 hours ago
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