जिसे तलाश थी बूंदों की उम्र भर शायद,
उसी के सामने सारा समंदर लाया गया।
वो एक शख़्स जो ताउम्र प्यासा ही रहा,
उसी के नाम का क्यों जाम फिर उठाया गया।
जिसे थी कद्र नहीं मेरी एक बूँद की भी,
उसी की राह में क्यों ख़ुद को यूँ बहाया गया।
मैं अपने हिस्से की बारिश लिए खड़ा था मगर,
मेरे ही घर से मुझे क्यों फिर से भगाया गया।
अजीब खेल है रिश्तों की इस रवानी का,
जहाँ न चाह थी मेरी कभी, वहीं बुलाया गया।
-रतन कुमार कैथवास