अक्सर वही दिए हाथ जलाते हैं,
जिनको हम हवाओं से बचाते हैं।
जिनके हिस्से धूप न आए,
उनके हिस्से अपनी छाँव सजाते हैं।
जिनके आँसू हमसे देखे नहीं जाते,
उनकी खातिर अपने ग़म छुपाते हैं।
जिन्हें गिरने से पहले थाम लिया था,
वही हमें गिरता देख मुस्कुराते हैं।
हम जिनके रास्तों में फूल बिछाते हैं,
वही हमारी राह में काँटे उगाते हैं।
जिन्हें अपना समझकर राज़ बताते हैं,
वही बाज़ारों में किस्से सुनाते हैं।
हम रिश्तों को उम्र भर सींचते रहते हैं,
मौसम बदलते ही उनके रंग बदल जाते हैं।
हम वफ़ा को अपना धर्म समझते हैं,
वो मतलब निकलते ही भूल जाते हैं।
अजीब दस्तूर है इस दुनिया का भी,
जिन्हें बचाते हैं, वही हमें आज़माते हैं।
अब किसी दिए को हथेली नहीं देते,
हवा चले तो बस दूर से ही देखते हैं।
लेकिन मन तो बहुत बेचैन ही रहता है,
जब दिया को तूफान में ही अकेले रहने देते हैं |
लौटकर फिर उसे बुझने से,
बचाने का प्रयास कर रहे होते हैं…
- रतन कुमार कैथवास