रीति-नीति हमारे समझ में नहीं आती,
दुनियादारी की बातें हमें कुछ रास नहीं आती।
किताबों की दुनिया में ही रहगुज़र है अपनी,
यहाँ झूठी चमक-दमक आँखों को कभी भाती नही।
लोग चेहरे पढ़ते हैं, हम किताबें पढ़ते हैं,
हमें हर बात में कोई चालाकी नज़र नहीं आती।
जिसे सच समझ लिया, उसी पर कायम रहे हम,
हवा बदलने पर अपनी बात बदलनी नहीं आती।
महफ़िल में बहुत लोग हुनरमंद हैं शायद,
मगर हमें बनावट की कोई अदा भाती नहीं।
काग़ज़ पर लिखे शब्दों में सुकून मिलता है,
इसलिए भीड़ में रहने की आदत हमें आती नहीं।
दुनिया चाहे हमें नासमझ कहती रहे मगर,
अपनी तरह जीने की कीमत भी हमें नहीं आती।
रीति-नीति के हिसाब से चलना छोड़ दिया हमने,
किताबों की दुनिया से बेहतर कोई रहगुज़र नहीं आती।
-रतन कुमार कैथवास