दुनिया से गिला होता तो, सह भी लेते हम,
अपनों ने ही जब लूटा तो, किससे करें शिकवा।
दुश्मन की साज़िशों से, कभी डर नहीं लगा,
अपनों की ख़ामोशी ने, मगर शक में डाला है।
जिसका था भरोसा, कि वो साथ रहेगा उम्र भर,
उसने ही बीच राह में, हाथों को छोड़ा है।
हमने तो दोस्ती को, इबादत समझ लिया,
उसने उसी रिश्ते को, सौदा बना डाला है।
अब ज़ख़्म की नुमाइश भी, किसके लिए करें,
जिसने दिया है दर्द, वही हाल-ए-दिल भी पूछता है।
-रतन कुमार कैथवास