किस ख़्वाब की ख़ातिर निकले थे, किस दर्द को पीछे छोड़ आए,
आँखों में अभी भी राहें हैं, कब तक ख़ुद को समझाओगे।
सहरा भी गुज़र गया तुमसे, दरिया भी पार किया तुमने,
अब पर्वत के उस पार भला किस दुनिया में घर बनाओगे।
हर मोड़ पे एक सवाल मिला, हर राह ने तुमको रोका है,
कब तक यूँ जवाब तलाशोगे, कब तक ख़ुद को आज़माओगे।
थक जाओ अगर तो बैठ ज़रा, ये राह कहीं भागी जाती नहीं,
जो मंज़िल दिल में ज़िंदा हो, उसको कैसे भूल पाओगे।
ये धूल तुम्हारे चेहरे की, शायद सफ़र की तहरीर है,
कल लोग इसी को पढ़कर फिर अपनी राह बनाएँगे।
मैं पूछ रहा हूँ इसलिए कि तुमसे अभी यारी बाक़ी है,
वरना इस राह के मुसाफ़िर से कौन हिसाब माँग पाएगा।
-रतन कुमार कैथवास