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तटस्थ दूरी

Ranjana Sood

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अगर उन्हें बोलकर ही
        
                                                    
                            
प्यार जताना पड़े,
अगर अपने ही जज़्बातों को
अंदर दबाना पड़े…

अगर अनकहे इशारे भी
समझ में न आएँ,
अगर रिसते हुए ज़ख़्मों पर
मरहम न रख पाएँ…

अगर वो आँखों की
भाषा से अनजान रहें,
सुनकर भी मन की बातें
फिर भी अनजान रहें…

एक ही छत के नीचे रहकर भी
जब मीलों की दूरी हो,
हर बात में शामिल बस
रिश्ते की मजबूरी हो…

न कभी व्यथित, न कभी प्रसन्न,
हर हाल में बस तटस्थ—
जहाँ मौजूदगी तो हो,
पर अपनापन नहीं…

फिर वो रिश्ता
अपना कहाँ ?
5 घंटे पहले
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