भगवान ने बनाया इन्सां को इंसान ने भगवान बना डाला।
मन्दिर , मस्जिद, गिरजाघर में प्रेम से उसे सजा डाला।।
कई तरह के धर्म बनाए उसमें भी भेद विभेद किया।
दया प्रेम को पीछे छोड़ा बैर का नहीं निषेध किया।।
मानवता को छोड़- छाड़ पशुता को अपनाया।
शान्ति-दूत बनने के खातिर भाई-भाई को लड़वाया।।
कहीं मिश्र , कहीं भारत, कहीं चीन, इरान बनाया।
कहीं जापान ,अमरीका कहीं रूस व पाकिस्तान बनाया।।
प्रगति के नाम विध्वंश किया पेड़-पौधों को झुलसाया।
काटकर पर्वत पाट नदी को कन्क्रीट का शहर बसाया।।
कर के बुरा औरों का हम अपने भले की सोचते हैं।
अपनी करनी की भरनी पर भगवान को ही कोसते हैं।।
संहार भले करलें जितना हम सृजन नहीं कर पाएंगे।
भगवान को भले बना लें, हम भगवान नहीं बन पाएंगे।।