विज्ञापन

कंबलमयी काया संन्यासी

Rakesh Ranjan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वैभव का विस्तार त्याग कर, तजकर सारा नश्वर मोह,
        
                                                    
                            
अतृप्त जगत के माया-बंधन, किए विखंडित निर्मल क्षोह।
ना प्रासाद, ना सिंहासन की, मन में किंचित् तृष्णा थी,
निष्काम कर्म ही जिनकी पूजा, सेवा ही बस निष्ठा थी।

क्षुधित जनों को अन्न समर्पण, साधना का आधार रहा,
त्याग, तपस्या, करुणा का वह, अनुपम पारावार रहा।
सिद्धियों का संवरण किया, चमत्कारों से रहे विरत,
अहंकार-विहीन चेतना, लोक-कल्याण में नित्य निरत।

विभव-विजेता, ऐश्वर्य-त्यागी, सादगी के उन्नत शिखर,
झुकते नतमस्तक चरणों में, कोटि-कोटि भूपाल प्रवर।
सर्वभूताय-सर्वसुखाय रति जिनकी, परम पुनीत संदेश दिया,
अहम्-विसर्जन कर अंतर्मन, भक्ति-सुधा का पान किया।

कंबलमयी काया संन्यासी, चित्त रमा श्री राम-स्मरण,
नीम करौली के संत बने, जन-मानस के दिव्य शरण।
त्याग-तपोमय जीवन जिनका, पावन जैसे सुरसरि-नीर,
वंदन हे कैंची-धाम-निवासी, हे कृपानिधान, गंभीर।
-राकेश रंजन
एक दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Vijay BindaasRaja

192 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

12711 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10438 कविताएं

View Profile