सावन की भीगी हुई शामों में बेटी लौटती है,
सूने घर की बंद दरों में बेटी लौटती है।
उम्र की गठरी काँधे रखकर, बालों में चाँदी लेकर,
माँ की आवाज़ों के घर में बेटी लौटती है।
आँगन अब तो छोटा-सा है, दीवारें कुछ ऊँची हैं,
फिर भी अपनी नन्ही उम्र में बेटी लौटती है।
नीम नहीं है, झूला नहीं है, कुआँ भी सूखा-सूखा,
एक पुरानी छाँव के नीचे बेटी लौटती है।
चौखट पर कुछ देर ठहरकर छूती है लकड़ी को,
जैसे कोई छूकर माँ के पाँवों को बेटी लौटती है।
बाबुल की वह खाट नहीं है, माँ की वह रसोई नहीं,
फिर भी दोनों की यादों में बेटी लौटती है।
जाते-जाते मुट्ठी भरकर चावल रख देती है,
घर की सोई हुई दुआओं में बेटी लौटती है।
कोई बुलावा नहीं, न चिट्ठी, न कोई संदेशा—
शायद अपने ही भीतर से बेटी लौटती है।
सावन हर बरस आता है, बादल भी आते हैं,
एक पुराना-सा दर्द लिए बेटी लौटती है।
घर से रिश्ता टूट गया हो, ऐसा कहाँ हुआ है—
मायका दिल के किसी कोने में लिए बेटी लौटती है।
-राजेश्वरी पंत जोशी